फ़लसफ़ा
By Ashish Nagori
मत पूछ मुझसे मेरी राह का फ़साना
इक दरिया जिंदगी का तैर के आया हूँ। ।
मत पूछ कितने पत्थर थे राहों में मेरे
मैं हर कदम पर जैसे ठहर के आया हूँ। ।
मेरे ख्वाबों के परों को आसमाँ की थी ज़रूरत
मैं जाने कितनों के सपने बिखेर के आया हूँ। ।
उम्मीदों से भरी है नज़रें, सब मुझ पर टिकी हुई
मैं सारी ही उम्मीदों से नज़रें फ़ेर के आया हूँ। ।
अब सर्द से लगते है दिल मुझे ज़माने वालों के मैं रिश्तों की नर्म रज़ाई उदहेड के आया हूँ। । बड़ा सटीक सा होता हैं मायना हर शब्द का मैं शब्दों के ताने बाने को छेड़ के आया हूँ। । मत पूछ मुझसे मेरी राह का फ़साना इक दरिया जिंदगी का तैर के आया हूँ। ।
By Ashish Nagori

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