प्रेमपथ
By Sonal Sachdev
प्रेमपथ,प्रेमपथ
एक निरंतर अग्निपथ,
एक अदभुत अनुभूति,
मन की मन्दाकिनी को नमन शत-शत।
गगन से लेकर धरा तक,
पर्वत से लेकर घटा तक,
नदी से लेकर सागर तक,
सागर से लेकर महासागर तक
विस्तृत,विशाल है प्रेमपथ,
भावनाओं का मनचला रथ !
प्रेमपथ,प्रेमपथ,
संघर्षो से लतपथ!
मनदीपक की ज्योति
तन की तीव्र दामिनी
अधरों का सावन प्यासा
नैनों में स्वप्नों का बासा
शवासों सा गतिमान प्रेमपथ,
संवेदनाओं का मार्मिक रथ!
प्रेमपथ,प्रेमपथ,
संघर्षो से लथपथ!
जो चल पड़े डगर पर तो चलते रहना तुम पथिक,
अभीक होकर गंतव्य ओर बढ़ते रहना तुम पथिक,
कठिनाइयों की काठ को काटते रहना तुम पथिक,
निराशाओं के प्रकाश को तिमिर करते रहना तुम पथिक !
पुष्पक विमान सा हिचकोले खाये प्रेमपथ,
द्वन्दों का एक अविरल,अंनत दौड़ता रथ!
प्रेमपथ,प्रेमपथ,
संघर्षो से लथपथ।
इस वांछा में हूँ कबसे के मैं भी चलूं इस पथ पर,
प्रेमशाला में कोई तो सफल प्रयोग करूँ डटकर,
आतुर हूँ,व्याकुल हूँ,जिज्ञासु हूँ ना जाने कबसे
कि मैं भी चलूँ नित नित इस विशिष्ट पथ पर!
जहाँ ना खड्ग है ना रक्त की झंकार है,
बस होती जहाँ प्रेमवर्षा मूसलाधार है।
कितना उत्कृष्ट,अनुपम,अद्वितिय है प्रेमपथ,
आकांक्षाओं का एक असीम, अनमोल रथ!
अब चलना है अविरल मुझे इस पथ पर
नित नित रिझाये मन को मेरे प्रेमपथ,प्रेमपथ!
By Sonal Sachdev

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