प्रेम का प्रमाण प्राणी
By Aditya Mishra
अप्रमाणिक सभी दावों के मुशकिल है जवाब
मगर आशिक तो हम भी है साहाब
इश्क इज़हार लफज़ियात एक भी ना झूठा है
ये इश्क ज़रा अनूठा है
चाँद पे खड़े होकर अंधेरो को ताकता है
आसमान ये कैसे बंद कमरो मे झाकता है
रगो मे कैसा खुशबुदार इत्र बह रहा है,
लहू भी देखो इश्क आबाद केह रहा है
प्रियतमा वो मेरी बर्बाद बस्तियों में घूमती थी
बेसहारे सिरो के माथे बेझिझक चूमती थी
उससे दिल्लगी मे देखो मै भी मजनू बना फिरता हूँ
मेरी प्रियतमा के कातिलो से रोज़ आकर घिरता हूँ
अब खत्म हो चुकी है, उसके हुस्न-ए-दीदार की सनक
मेरी मौत भी वही लिखेगी इसकी कहाँ थी भनक
बन पाक आयना वो मुझे दूसरो पर मरना दिखा गई
एक को पाने चला था वो तो सबको पाना सिखा गई
अपने प्रेम को भी कोई इतना अनाधिक बनाता है?
तालाब मे भी भला को जहाज़ को तैराता है ?
उसका ये पूछना उसके सौंदर्य को और भी सवार देता था
मेरी बदसूरती को भी उसी क्षण निखार देता था
उसने आखिरी प्रेम पत्र एक आदेश मुझे भेजा था
मेरी नम लाल आँखो ने जमकर जिसे देखा था
की मृत्यु शैया पर भी अगर तुझे कोई याद करे
उसकी सेवा पेहले हो और ख़ुदा बाद रहे
इन तमाम कैदो से देखो मैं आज़ाद होने जा रहा हूँ
उसकेइश्कमेंदेखोमैंबर्बादहोनेजारहाहूँ।
By Aditya Mishra

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