प्रेम
By Kunal Verma
कोई हैं जिसने अनकही बातों में
अनदेखे रास्तों में,
पहाड़ों से राहें खोद कर,
दुनिया से लड़ कर, झगड़ कर,
अकेले ही खड़े हो कर, डट कर,
मेरा साथ दिया हैं।
मेरी गलतियां को मेरी माफी के बिना
मुस्कराते हुए, बेझिझक हो कर,
बिना शिकायत, आंखें मूंद कर
बेइजहार, मुझे माफ़ किया हैं।
ऐसा एक बार नहीं सौ बार किया हैं।
हर इश्क, प्रेम और मुहब्बत के हदें पार कर,
दुनिया में सबसे ज्यादा मुझ पर एतबार कर,
दुनिया से सारे नाते तोड़ कर,
बेखुद, बेसुध हो कर,
हर सांस मुझ पर कुर्बान किया हैं।
ऐसी कोई स्नेहता नहीं जो इस मुकाम को छू सके,
ऐसी कोई प्रियता नहीं जिसमें इतनी शिद्दत हो सकें,
वो एक ही हैं, वो एक ही हो सकती हैं,
उसके किरदार अनेक हैं,
और वो हर मुसीबत रोंध सकती हैं,
वो राहत जिसकी बातों में हों,
वो ताकत जिसके साथ होने से हों,
वो गरमाहट जिसके आंचल में हों,
वो जो मेरी आहट भी पहचानती हैं,
वो जो मुझे सबसे ज्यादा मानती हैं,
वो सिर्फ मां हैं, वो सिर्फ मां ही हो सकती हैं।
By Kunal Verma

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