प्रेम
By Shweta Khati
मैं उठती-बढती लहर तुम्हारी
तुम सागर हो जैसे कोई
तुम सर्द रात का चाँद हो जैसे
मैं चाँदनी तुम्हारी शीतल कोई
तुम सूर्य की जब किरण बनो
मैं पिघलता प्रेम में हिमकण कोई
तुम वृक्ष की जो शाख हो
मैं शाख का जैसे पत्र कोई
तुम गरजता जैसे बादल हो
मैं तड़ित प्रकाशित विद्युत कोई
मैं बीज हूँ धरती में जैसे
तुम वर्षा की फुहार पहली कोई
ऐसा प्रेम तुमसे परिभाषित
फिर नाम की सीमा क्यों हो कोई ?
By Shweta Khati

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