प्रेम
Updated: Sep 20, 2022
By kajal Bindal
प्रेम वो ठंडी छाया हैं…
जिसकी शीतलता में जो आया हैं….
ख़ुद का ठहराव सा पाया हैं…
प्रेम वो तपता सूरज हैं…
जिसकी ऊष्मा को जिसने पाया हैं…
उसके चेहरे पर तेज समाया हैं…
प्रेम वो सब्र का बांध हैं…
जिसका पार बस वो ही पाया हैं…
जिसको पा लेने से ज़्यादा, त्यागना आया हैं…
प्रेम वो क्रांति हैं…
जिसमें आवश्यकता नहीं किसी शस्त्र की…
बस भावनाओं और समर्पण का ही इसमें प्रभाव हैं…
प्रेम में ही वो अद्भुत सुंदरता हैं…
जिसमें रंग का कोई भेद नही…
मन का भाव जो साफ़ है, तो रास्ता आसान हैं…
By kajal Bindal

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