प्रियतमा का परित्याग
By Aditya Mishra
गोद मे तेरी रखकर सिर अपना मैं सोता भी था, और उठता भी था
ज्येष्ठ की गरमी का हो या सर्दियों की नरमी का, ये सूरज तेरे ही आँगन में उगता भी था और छुपता भी था
तेरे दीदार-ए-हुस्न में बर्बाद कितनी जवानी हुई,
तू सदैव सुंदर रही, आँखे जितनी पुरानी हुई
ना सिर पर तेरे बिंदी ना पैरो में पायल है
फिर भी तेरी जालसाज़ी मे, देवता भी कायल है
पर उन पुकारती आवाजो ने इस योग निद्रा से जगा दिया
अती-शीतल जल मे सारा तन बदन डुबा दिया है
अब सांस मुझे यहाँ से निकलकर ही आएगी
पर मेरे जाने से तेरे हुस्न में ज़रा कमी ना आएगी
हो सका तो इस हुस्न का दीदार जन्नत में करूंगा
वरना इतना तो तय नरक में सबसे पहले तू ही याद आएगी
हमारा ये नीच प्रेम प्रसंग हमेशा रहेगा अधूरा
मैं तुझे अर्ध मरण पर आधा मिलूंगा और पूर्ण मरण पर पूरा
खुद को निर्बल तुझे, शक्ती स्वरूप स्वीकारता हुँ
जाओ प्रियतमा मै तुम्हे त्यागता हुँ।
By Aditya Mishra

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