प्रवासी लड़की
By Suman
मैं सोचती हूं कहां से हूं ?
वहां, जहां रहती हूं या जहां से आई हूं,
यह जहां से मां बाबा को आना पड़ा था कभी,
मैं जहां रही वहां की नहीं कही गई कभी,
अब यहां की भी नहीं हूं,
पर सिर्फ मैं जानती और समझती हूं कि मैं इस पूरी दुनिया की हूं,
यही रहूंगी।
पर आदमियों के बीच किसी जगह का होना जरूरी है?
वहां की बोली और यहां के बादल मुझे याद आते हैं जब मैं यहां या वहां होती हूं,
पूरी एक दुनिया बार-बार बनाती हूं, बसाती हूं और एक जगह पर वहीं छोड़ कर आ जाती हूं,
एक नई दुनिया में,नई दुनिया में रहने, जीने, बसने।
ठहराव नहीं है,ना मन में,दिल में,ना दिमाग में,
जो कि कभी-कभी बेहद अच्छा लगता है
और कभी कभी रुकती हूं तो स्तब्ध रह जाती हूं सामने यह नितांत बढ़ती बदलती दुनिया पाकर।
By Suman

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