प्रवासी मजदूर- मजबूर
By Bhuvanesh Arya
दोघुटजोचाहिएपानीकी,
कदमहजारचललेतीहूँ।
दोघुटजोचाहिएपानीकी,
कदमहजारचललेतीहूँ।
नन्हीआंखेंभूखींदेखींमुझे,
अपनीइज्जतभीनीलामकरदेतीहूँ।
मैंख्वाहिशेंकीबंधीनहीं,
मज़बूरीमेंकोठानाचकरतीहूँ।
मेराखुदकाकोईघरनहीं,
सड़केंखाकसाफ़करलेतीहूँ।
तुमअच्छेहोकितनेशहरी,
हजाररुपयेभीदिएतुमने
दसपंद्रहासालमैंजोरहींवहाँपर
किरायेमेंपुरेकरदियेतुमने.
चलदीमैंउसगांवकीओरअब,
जहाँलोगमुझेछूनेसेड़रतेहैं।
परक्याकरूंइनशहरोंसेतोह,
वोजमींदारहीअच्छेहै।
तनपरकपड़ानहीं,
इज्जतरोजनीलामहैंवहाँ।
परवोनन्हीआंखेंभरी,
बसमेरीशर्मसारहैवहाँ।
अमीरतुमदिखावेकेकितने
हमदर्दीभीमतलबसेदेतेहो।
कलतकथीमैंदीदीघरमें,
आजगंदीबस्तीबीमारीकहतेहों।
परमैंकौन, मेरायहांक्या,
भूखीरहूं, चलीजाऊँ, मरूं, तुम्हेंक्या,
जिंदगीमेरीनीलाम, अमीरकिसीकोक्या,
बच्चेतुम्हारेभगवानतुम्हाराहमाराक्या ?
By Bhuvanesh Arya

Comments