प्रलय
By Utkarsh Mishra
जब समूचा संसार खड़ा हो
प्रलय के मुहाने पर
और अपने सीमित बौने दिमाग से
बुद्धिजीवी कर रहे हो तबाही का विश्लेषण
तुम बैठ जाना मेरे समीप
और बचा लाना थोड़ा सा प्रेम
जो वापस जीवित कर सके एक पौधा
जब बुद्धजीवी निरर्थक बातों से
तबाही का व्याख्यान करेंगे
तब जाग्रत करेंगे हम अपने प्रेम से
एक नये ब्रम्हाण्ड को
हम भर देंगे उम्मीद और भरोसे से
उसकी हर एक डाली
स्वतः ही उस वृक्ष पर उगेंगे
आत्मीयता के मधुर फ़ल
जो ब्रम्हाण्ड को विध्वंस के बाद
नव जीवन का मार्ग दिखाएंगे
कुछ इस तरह टल जायेगी प्रलय
तुम्हारेमेरेसमीपबैठनेमात्रसे।
By Utkarsh Mishra

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