पोथी की गलती
By Ashutosh Sharma
पोथी में तेरा नाम लिखा है,
मैंने कॉपी में वही लिख दिया
इसके तो पूरे मार्क्स मिलते होंगे न
या तू भी किसी गहन टीचर सी होती होगी
जो कह दे कि नहीं पढ़ने मुझे तुम्हारे रटे-रटाए जवाब
जाओ, पहले मुझे ठीक से पढ़ो, समझो
और अपनी सोच से लिखकर आओ कुछ।
हाँ कह देता मैं और एक पल का निर्णय भाव भी आ जाता।
हालाँकि बहुत जल्द लेकिन अपनी ही धीमी गति से
समझ आता कि तुम्हें पढ़ जाता मैं,
तुम्हें समझ जाता मैं, तो अकील हो जाता मैं।
उन मृत पेड़ों से बने कागज़ों में
उस सूख चुकी स्याही के मोड़ों में
रखा है सारे जहान का हिसाब
सारे बिन पूछे सवालों का जवाब।
लगभग दस हज़ार करोड़ पोथियाँ हैं
हर एक में है उतने ही या थोड़े ज़्यादा शब्द।
चक्कर से आने लगे उन शब्दों को घूरते हुए।
मैंने कुछ दुकानदारों से पढ़वाया
तो कहने लगे यह फ़ेहरिस्त है
जनाब कोई जन्नत सी दुनिया सजाने की।
गूढ़ियों से पढ़वाया तो बहकर कहने लगे
बेटा, यह तो किसी की उलझनों
का सबब है और मर्ज़ भी।
बहुत दिनों तक चला यह अन्वेषण।
मैंने शायद वक़्त ज़ाया कर दिया तमाम उम्र का।
अब आखिरी इम्तेहान की तैयारी करनी है।
तूने कहा है कि पोथी नहीं बदलेगी।
मैं शायद फिर वही लिख आऊँगा।
उम्मीद है इस बार भी तू कहेगी
ठीक से पढ़ो और समझो मुझे।
मैं लूँगा एक जन्म और
इस परीक्षा में फिर से फ़ैल होने के लिए।
By Ashutosh Sharma

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