पुरुष के आँसू
By Utkarsh Mishra
इतिहास ने किया अन्याय
सदैव पुरुष के आँसूओं पर
कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में
हुआ बखान तो द्रोपदी के केशों का
राजाओं के भुजबल का
कर्ण के अत्याचार का
केशव के न्याय का
नहीं हुआ ज़िक्र तो
पितामह के भीष्म अश्रुजल का
जो प्रतिज्ञा की धूप में
हर दम सूखते रहे
न मिला सम्मान गुरु द्रोण के आँसुओं को
जो छलिया के छल से
धर्म की सूली चढ़ा दिये गये
जब विकल हृदयवश
छोड़ दिया था अर्जुन ने गांडीव
उदास था मन देख परिजन को सामने
तब नारायण ने विवश किया
अर्जुन को गीता ज्ञान दिया
उस ज्ञान तले न थी कोई कद्र
पार्थ के आँसुओं की
इतिहास ने लिखा सीता की
अग्निपरीक्षा का दर्दनाक व्यातान्त
पर नही लिखा तो राम के आंसुओं को
जिसमें डूब छोड़ना पड़ा ब्रम्ह को सकल समाज
समय ने तब भी गलत किया था
समय आज भी न्याय में विफल है
हमने लिख दी अनेकों कविताये
माँ के साहस और प्रेम पर
हम ना लिख पाये तो
पिता के संघर्ष की व्याख्या
जिस संघर्ष के तप से निकलता तेज
आज विराजमान है हमारे मुखमंडल पर
और तप से उत्पन्न वो भाप रूपी अश्रु
जिसकी घुटन में हर पल पिताओं ने
काटा बिना कोई शिकायत
कि बना रहे तेज हमारे मुखमंडल पर
और फैलता रहे जग में प्रकाश
हम ना लिख पाये तो
भाई का भाई के लिये दर्द
पिता का बेटे के प्रति स्नेह
पुत्र का पिता के लिये सम्मान
और मर्द का औरत के लिये इश्क़
हमने तब भी नकारा था पुरुष के आँसू को
हम आज भी कर रहे उनको दरकिनार
तब भी मिट गया था समाज
आजभीबहुतकरीबहैविध्वंस।
By Utkarsh Mishra

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