पुरानी किताब.
By Raj
पुरानी किताब में रखे गुलाब की महक आ गई,
गुजरी हुई बातें आज फिर याद आ गई ।
जिन्हे सोच लिखा करते थे शेर ओ गज़ल,
उसी की बात हमे आज फिर याद आ गई ।
खैरियत अदा फरहाम करते है उसे,
दुआ सलाम ही सही वो फिर साथ आ गई ।
अभी ठंड की रातें ही गुजर रही थी हमारी,
न जाने कमबख्त कहां से वो बरसात आ गई ।
'दिल ' भी ठिठुरे या सिर्फ हम ही कांपे,
तेरी ठिठुरन से ही तो जिस्म में जान आ गई ।
दीया सलाई से जोया है ताक का दीया,
रोशनी ऐसी उसकी के हमारा साया खा गई ।
स्याह काली ऊपर से रात काली एक खत था बाकी
उसे भी हमारी किताब खा गई ।
By Raj

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