पुराना प्यार
Updated: Dec 2, 2022
By Bhanupriya
पिछले हफ्ते नवरात्रा पर घर से बुलावा आया। मां बिमार थी। फोन रखते लगा मानो वज़न बढ़ सा गया हो सीने पर। एक उदासी सी महसूस हुई, या शायद बेचैनी। तुम्हारे बाद घर जाने से मन कतराता है। पर जाना जरूरी था, तो मैं आ गई। स्टेशन से घर का रास्ता भी किसी लंबे सफर से कम नहीं।
देखने को तो शहर में अब भी कुछ नही बदला है। शोर उतना ही है गाड़ियों का। वो ccd जहां हम मिला करते थे अब भी वहीं है। कुछ चेहरे बदल गए है लेकिन।
ये रास्ते भी तुम्हारी यादों से सराबोर है सारे; बहरहाल कुछ लंबे लग रहे है। वही दुकानें, कुछ बदली तो है पर खास नहीं।
तुम्हारे घर की तरफ जाती वो सड़क कितनी दूभर लग रही है अब। उफ्फ!! मन बोझिल हो रहा है। कितने बरस बीत गए है, पर लगता है मानो कल ही कि बात हो। और ये रास्ता न जाने और कितना लम्बा है। सड़के बस चलती है अब, कहीं पहुँचती नहीं। इतने शोर में भी भीतर सन्नाटा है अनायास। और तो और शहर की हवाओ में तुम्हारी महक भी नहीं।
यहाँ से आगे जाकर एक गली पड़ती है दायीं ओर। वहीं, जहाँ मैं तुम्हारा इंतजार करती थी हर रोज़। उसी दरख्त के नीचे मन कहीं अटक सा गया है। मैं और वक्त, वहीं रुक गए है दोनों। इस दफ़ा तुम गुज़रो वहाँ से...तो मुझको भी लेते आना...।।
By Bhanupriya

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