पुनर्विवाह
By Dr. Suboohi Jafar
वैसे तो हम समाज में बहुत प्रगति कर चुके हैं,
किंतु आज भी पुनर्विवाह को पूर्ण समर्थन और सम्मान प्राप्त नहीं है,
जब भी पुनर्विवाह की बात छिड़ती है,
तो होता कहीं न कहीं उपहास और तंज़ ही है।
क्या भला है, क्या बुरा है, सब इस बात पे चिंतन करते हैं,
कहने को तो पक्ष में, प्रत्यक्ष रूप से दिखते हैं,
पर कहीं न कहीं एक अंकुश भी मन में रहता है,
हर पग-पग पर चरित्र मंथन करते हैं।
कोई ज्ञान देने बैठ जाता है, संधि करने के लिए,
जो हो गया, उसे भूल जाओ, ये कहने के लिए,
वह मानसिक यंत्रणा समझ पाना जटिल है सबके लिए,
लोग कहानियों की तरह सुनते और सुनाते हैं, चटख़ारे के लिए।
जो विधवा हैं, उनको अलग तिरस्कृत किया जाता है,
सशक्त नारी होते हुए भी, बोझ समझ लिया जाता है,
उन धुंधले सपनों की साँसें, पति की साँस के साथ टूट जाती है,
अर्थी के संग, श्वेत वस्त्र में, शमशान में ही रह जाती है।
रक्षक और भक्षक में अंतर करना मुश्किल हो जाता है,
चेहरे पे चढ़ी क़लई पे, विश्वास करना असंभव है,
भूल जाते हैं लोग, स्त्री के भी अपने सपने हैं, जिन्हें उसे पूरा करना है,
मत बांधो उसे, छोड़ दो खुले आकाश में, उसे भी जीना है।

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