पीढ़ियाँ: कल, आज और कल
By Sonal Mathur
ज़माने बीत जाते हैँ समझने-समझाने में,
गुज़र जाता है वक़्त गुत्थियां सुलझाने में।
बच्चे थे तो हठी थे, उम्रदार हैँ, तो क्या कम है,
ना सनझने की अभी भी इच्छाएं बरकरार है।
फंस गया है ऐसे आज इस जाल में,
छूट गया बचपन और बुढ़ापे के इंतेज़ार में।
एक हो जाते हैँ जब मिलते हैँ साथ, दादा और पोता,
रह जाता है देख खड़ा असमंजस में पड़ा बेटा।
खूबियाँ दस गिनवा देते हैँ मिलकर,
आज खड़ा होकर देखता है यह मंज़र।
यही तो जीवन का ताना-बाना है,
कल बचपन, आज जवानी और कल बुढ़ापा है।
समय के इस कल्पवृक्ष ने दिया तमाम सुख,
बस जीवन की आपाधापी में छूटा बहुत कुछ।
साथी हैँ मेरे जीवनराह के दोनों,
कभी बेटा तो कभी बाप हैँ मेरे दोनो।
बिन इनके सब कुछ अधूरा-सा लगता है,
छूटे ना साथ, अब खुदा पर भरोसा लगता है।
कितने ही उतार-चढ़ाव आते-जाते हैँ,
हिम्मत बने खड़े इन्हे आस-पास पाते हैँ।
लगता हूँ अधूरा-सा, तन्हा खड़ा सोचता हूँ,
कल, आज और कल में ही तो जीया करता हूँ।
कल, आज और कल में ही तो जीया करता हूँ।।
By Sonal Mathur

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