पापा और बेटे का रिश्ता
Updated: Sep 16, 2025
By Rishika Devesh Gupta
"मुझे आपके साथ बाहर जाना है", कहे बेटा अपने पिता से
हाँ बेटा चलो पार्क, चले चलो।
बेटा खुशी खुशी अपने पापा की कलाई पकड़
चल पड़ा अपने पापा की दिखाई राह पर,
बिना हिचकिचाय, बिना कोइ सवाल पूछे
मस्त मौला हुआ वो बेफ़िकर।
अरस बीते पिता का लाड़ला जवान हुआ
उस पर ज़िम्मेदारी का सैलाब टूटा
अब पापा पिछड़ी सोच वाले लगने लगे,
थोड़े ज्यादा कंट्रॉलिंग लगे
बैकवड़ और सख्त लगे
अपनी सोच उनपर हावी करते हुए दिखाई पड़े
पर पिता केवल जता रहे उनकी ममता
जो बेटे के समझ से परे था ।
दोनों पापा- बेटे अपनी भावनाओ को व्यकत नही कर पाए
एक दूसरे से अंजान होते चले जाए
पर बाप बेटे का रिश्ता एक पल का तो था नही
जो यूँही नकार दिया जाए
ममता दोनों के मन में समान थी
पर शायद प्यार केवल काफी ना था।
थोड़ा और दोनों को एक दूसरे समझना बाकी था,
यदि अगर पिता लाडले को समय के साथ बड़ा होने देता
तो शायद ये पूरा मामला ही नही उठता
बेटा अगर पिता की भावनाओ का आंकलन कर, उनको अच्छे से समझता तो शायद कुछ बात बनती
पर जैसा मैंने कहा, ये ऐसा कठून मसला जिसमें प्रेम खाली काफी नही
तो इसलिए मै तो बहुत नादान हूँ
इस सवाल को सुलझाने में
बाप बेटे का रिश्ता समझना अत्यंत कठिन है
आखिर भगवान शिव ने भी अपने पुत्र को धड़ से अलग कर दिया था क्रोध के आवेश में
तो हम तो इस दौर के इंसान है
हमारे भीतर भावनाओ का सैलाब उमड़ पड़ता है
एक एक पल बदलता रहता है,
तो हमारा अभी विकसित होना बाकी है,
रिश्तों के माईने अब भी समझना बाकी है।
By Rishika Devesh Gupta

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