पानी (एक कविता पापा के नाम)
Updated: Dec 3, 2022
By Shriddhi Singhal
भर- भर के बरस रही थी,
एक बुंद को तरस रही थी।
वो बाड़ मे फश रही थी,
पानी को तक रही थी।
आँखों मे आँशु थे,
पैरों मे चप्पल नहीं।
साँस लेने मे तकलीफ थी,
दिल मे अब और कोई आस नहीं ।
धीरे- धीरे अस्त हुई,
धुप मे फस त्रस्त हुई ।
पानी जो सर से उपर गया,
पानी जो सत् दिन से नहीं मिला ।
एक को डूबा तो दूसरी को सुखा ले गया ।
तरसती रही एक आस को तो एक प्यास को ।।
By Shriddhi Singhal

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