पहाड़ पर चढ़ते हुए
Updated: Aug 21, 2025
By Aditya Jha
धरा को स्पर्श करते नभ
या गगन को भेदती धरा ?
पहाड़ी ढलान पर'
फैला था माया जाल।
रुई के फाहे से
श्वेत, श्याम, बदरंग ।
हवा में अविराम तिरते बादल,
कभी गज, मीन, ग्राह
तो कभी पर्वताकार ।
कनपटी से गुजरते हुए
कच्चे वाष्प की गंध ।
ऊँचे नीचे पेड़ देवदार के ,
चीड़, महोगनी, फर्न, लताएँ,
रूप बिखेरे हमें बुलाएँ ।
दूर नजर तक हरी भरी हुलसती
दार्जीलिंग चाय की क्यारी,
आड़े तिरछे पगडंडियों पर
कमर झुकाए बढ़ते श्रमवीर
पर्वत के नर नारी ।
ऊँचे शिखरों से झाँका नीचे,
पाताल से निकलता दिया दिखाई
चुपके चुपके गेरू रंग में,
ढला केसरिया भास्कर ।
`टाइगर हिल' का जादू था
या रॉक गार्डन की गंगा माया,
होता तन मन रोमांचित
है चरण स्थित तरु शिखरों पर !
अभी अभी तो खिली धूप थी,
अभी अभी बादल घिर आयी ।
पल में पीयूष गिरा अम्बर से
टप टप छप छप ,
झर झर निर्झरिणी गिरी से गिर आई ।
मन चचल दौरे गति मंथर ,
कभी हिरण बन भागे सरपट ।
तन खाता हिचकोले नैया बन
बार बार लहरें लांघे तीस्ता तट l
कर्ण हुए संवेदन शून्य बार बार
उत्तुंग शैल राज के मध्य में,
ये गहन, सघन कानन उपत्यका ,
सौंदर्य बंध न सके गद्य पद्य में ।
अभिराम दृस्य छोड़ते अमिट
छाप मानस पटल पर,
सीढ़ी दार बागान मानों
पहुँचाते स्वर्ग द्वार पर ।
By Aditya Jha

Comments