पत्र का दर्द
By Vibhav Saxena
मैंने जब खोली अचानक अलमारी
तो पत्र एक पुराना मुझको मिला|
पढ़कर गुजरी यादें ताजा हो गयीं,
कितने प्यार से था मित्र ने लिखा|
अचानक लगा जैसे रो रहा है पत्र,
ये देखकर मैं तो वाकई हैरान हुआ|
मैंने पूछा उससे कारण रोने का जब,
तो जवाब सुनकर मैं परेशान हुआ|
पत्र बोला मुझे अब पूछता है कौन,
रिश्ते निभते हैं स्वार्थ की नीति से|
सोशल मीडिया ही तो सब कुछ है,
भावनाएँ दिखाते हो इसी रीति से||
ना पत्र जैसा प्रेम है ना ही वो प्रतीक्षा,
मानव को समय बचाने की है इच्छा|
कुछ भी पोस्ट करने का चलन है अब,
संस्कार दिखते हैं ना ही अच्छी शिक्षा|
एक दिन पत्रों को संग्रहालय में रखकर,
हर एक आगंतुक को दिखाया जाएगा|
ये थे कभी भावना संवेदना के वाहक,
हंसकर सबको यह भी बताया जाएगा|
पत्र तो चुप हुआ पर मैं सोचने लगा,
कि हर कोई एक दूजे से दूर हो गया|
पत्र लिखने का चलन बन्द क्या हुआ,
स्नेह का हर नाता भी जैसे खो गया|
By Vibhav Saxena

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