नज़रों का खेल न खेल प्रिय
By Shashank Kumar Sinha
नज़रों का खेल न खेल प्रिय
ये दुनिया नहीं, है भ्रमजाल प्रिय
नज़रों को उलझाना जीवन उलझाना है
यह उलझन - सुलझन का खेल नहीं
यह खेल है एहसासों का,
यह खेल है आती - जाती श्वासों का,
हर एहसास है अपनापन का,
हर एहसास है नवसृजन का,
हर श्वास में कोई अपना है
हर श्वास दिल तक जाती है
वहाँ एहसास से मिल जाती है
फिर सुर्ख रागों से दौड़ जाती है
सीने को मचलाती है
इन सब में मन खो जाता है
एक विचार की ओर मुड़ जाता है
यह मिलन है साँसों - एहसासों का
जो समझ जाता है वो नश्वर है
जो उलझ जाता है उसके लिए एक छल है
यह अंधविश्वास है इसका
कोई नहीं उलझता है फंसकर
कोई नहीं समझता है इसमे आकर
यह तो प्रेम है
लोग एहसासों के अनुसार पाते हैं इसको
लोग बुद्धि के अनुसार निभाते हैं इसको
यह जीवन तुम्हारा जीवन है
मैं का यहां कोई मोल नहीं
हम होने में ही सारी खुशियां हैं |
By Shashank Kumar Sinha

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