नज़र चुरा रहा हूँ
By Dharam Singh Meena
क्यूँ तुम मुझसे नज़र चुराते हो, क्या कि कोई खता तूने जो नज़र बचाते हो |
हाँ मैं ये खता कर बैठा हूँ, नहीं करना था वो इश्क़ जो खुद से भी ज्यादा तुझसे कर बैठा हूँ |
ना हो तुमसे इतना प्यार कि तेरे बिन रह भी ना पाऊं, इसीलिए चाहता हूँ नज़रो से तेरी मैं अब ओझल हो जाऊ |
जितना तुझको देखू ये इश्क़ और बढ़ता जा रहा हैं, इसीलिए ये दिल भी अब तुझसे नज़र बचा रहा हैं|
कहीं आदत ना लग जाये इसको तेरे दीदार कि, इसीलिए कर दी हैं मैंने कमी अपने ही इस प्यार कि|
बस इसीलिए तुझसे मैं अब नज़र चुरा रहा हूँ, नहीं कि हैं कोई खता बस अपना ये इश्क़ तुझसे छुपा रहा हूँ|
मैं इसीलिए तुमसे नज़र चुरा रहा हूँ, मैं इसीलिए तुमसे नज़र चुरा रहा हूँ |
By Dharam Singh Meena

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