नींद प्यारी नींद तू कहाँ थी
By Sonal Mathur
नींद प्यारी नींद तू कहाँ थी,
आँखें बंद किए अपने को समझाती।
कितने अरसों से मैं सोई नहीं,
इंतेज़ार में रातें कितनी खोई यूं ही।
नींद प्यारी नींद तू कहाँ थी?
पलके झपकाती, इधर-उधर भटकती,
कभी सिलवटों से जूझती, तो कभी करवटें टटोलती।
कई मन्नतों के बाद नहीं आई फिर भी,
नींद प्यारी नींद तू कहाँ थी?
हाथों से आँखों को मलती,
नयनों में कई सपने बुनती।
बादलों की चादर से ढकी,
साँसों सी धुन में घुली।
नींद प्यारी नींद तू कहाँ थी?
सपनों के सौदागर भतेरे,
करने आए अलग ये तुझसे।
कसकर मूंदे आँखों को मैं,
सोच रही हूँ कब आओगी।
नींद प्यारी नींद तू कहाँ थी?
चाँद की रात में चांदनी-सी खिलती,
सुबह की पहली किरण में लिपटी।
ओस की बूँद के साथ टपकती,
महक उठती बनके कली फूलों की।
नींद प्यारी नींद तू कहाँ थी?
By Sonal Mathur

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