निःशस्त्र निढाल
By Kunal Deepak Devre
कुछ यूँ बनी है परिस्थिति तेरी, कुछ यूँ है तेरा हाल,
सामने हालात सशस्त्र खड़े है, लेकिन तू निःश्स्त्र, निढाल.!
कुछ करना है इस वक़्त में, उठ बुलंद कर अपनी चाल,
पाना है मंज़िल तुझे, चाहे गले तेरे हाड मांस या खाल,
छोड़ फिक्र की उन रेखाओं को, छेड़ कोई आज़ाद सी ताल,
तंगऐश इस वक़्त ने बिछाया है 'अपनों' का ही जाल,
तोड़ उसे, काट उसे, संभाल अपना हाल,
होगी एक तंज़ील ऐसी, करेगा वो महांकाल,
समय का ये वार है, उठा शस्त्र, अड़ा दे अपनी ढाल
हालातों से हार गया, तो इंसान तु नश्वर, निढाल,
हार मत, टूट मत, उतार फेंक बुजदिल खाल,
लड़ तू, आगे बढ़ तू, ओढ़ मेहनत की शाल,
कर हौसला बुलंद इतना, सारे जहां में तेरा हो इकबाल,
आज़मा अपना हुनर ऐसे, होगा जरूर तू बहाल,
दरिया - ए - इत्र तेरे पसीने में कैसे, होगा तेरे अपनों को मलाल,
तोड़ अपनी जंजीरों को, सुधार अपना हाल,
सामने हालात सशस्त्र हो खड़े, न रहे तू निःश्स्त्र निढाल.!
By Kunal Deepak Devre

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