नासमझ
By Paras Minhas
कितना जितना सुना तुमने,
माना जाना पहचाना तुमने,
उतना जितना जाना तुमने ,
जीतना हमें माना तुमने॥
वो राते सब बाते इक़रार इज़हार,
पलट्कर सब हमने जाना इक़बार॥
क्यों राते यूं लंबी , सब बाते यूं छोटी ,
कहकर तुम ही फ़रेबी वो लौटे हरबार॥
इश्क़ के वादे सब झूठे, बस तुम ही हो रूठे,
बस वो ही अकेले हैं आशिक़ बेशुमार॥
जान जिस्मों में बसी, ये हकिक्त बड़ी,
ख़ैर हकिक्त से दूर जान जिस्मों पे अड़ी ॥
जान कहकर वो बेशक बुलाए तुम्हें,
मगर बाते हो ये मुकम्मल तो ही खरी॥
जान जाती गई जान आति गई,
जानकर जान को जिस्मों से बदला गया॥
कुछ अनजान बने कुछ नए जान बने,
और इन्ही रास्तों पे वो चलता गया॥
बातों बातों में बाते तो है बहुत मगर,
हम ही वो साहिल जो ज़ाहिल खड़े॥
सब जाना है हमने और माना भी मगर,
नास्मझी बहुत जिसको लेकर अड़े॥
नास्मझी बहुत जिसको लेकर अड़े॥
By Paras Minhas

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