नाव की छोर पर बैठी हूं
Updated: May 31, 2023
By Anuja Sharma
नाव की छोर पर बैठी हूं
कि चलो
उठो
अब यहां और नहीं रहना
अब कूद जाना है
इस गहरे काले पानी में
जोकि मेरा मन है।
बुलाता है वर्षों से
ये गहरा काला पानी
कि आओ
और मुझमें समा जाओ
मुझे पी लो
इस कदर
की तुम्हारे रोम रोम में
मैं ही मिलूं
मरणोपरांत।
नाव की छोर पर बैठी हूं
कि ये आसमां बाहें फैलाए है
थोड़े गुस्से में
कहता है आओ
कूदो
और तुम गिरोगी नहीं
मैं जो हूं
वर्षों से तुम्हारे लिए
तुम्हारे घर की छत
तुम्हारी बरखा का घर
तुम्हारे ब्रह्मांड का एक छोटा सा कक्ष
कूदो
कि तुम उड़ पाओगी
क्या मैं ना देखता था
तुम्हें हमारे बचपन में
टैक्सी से मेरे चांद का
पीछा करते हुए
कि अब यहां और नहीं रहना
आओ कूदो
मुझ मद्धम नीले अम्बर में
कि आओ
और मुझमें समा जाओ
मुझमें उड़ो
इस कदर
की तुम्हारे चेहरे पर
चांदनी ही मिले
मरणोपरांत।
नाव की छोर पर बैठी हूं
बुलाती हूं मैं खुद को
कहती हूं अब तो कूद ही जाओ
कूदो अगर तुम खुद से कह सको
कि तुम अब सुबह के सूर्य
कि और तस्वीरें नहीं लेना चाहती
कि तुम अब चांद को घंटो बैठ कर
और निहारना नहीं चाहती
कि अब तुम्हे तूफान बिजली और बारिश
से सब नाते तोड़ने में कोई हर्ज नहीं
कि अब तुम अपने चाहने वालों के
जन्मदिन पर उनके साथ
उनकी खुशी में
शामिल नहीं होना चाहती क्या?
कि वो जिनके लिए खत लिखकर
तुम चल पड़ी हो
उन्ही के प्यार, उन्हीं के स्नेह में, वो बल नहीं
तुम्हें कुछ और सांसें लेने के लिए
बिना कुछ कहे रोक लें।
कि तुम्हे अपने बालों में,
अपनी किताबों में,
हल्के बैंगनी रंग के
फूल अब और पसंद नहीं आते क्या?
कि अब तुम अपने फोन की स्टोरेज को
अपनी पसंदीदा चीजों के छायाचित्रों
से नहीं भर देना चाहती क्या?
कि अब तुम अपने पिताजी और दादाजी
के ज़माने के संगीत को
और नहीं सुनना चाहती क्या?
कि अब तुम दुनिया भर की कविताएं
पढ़ना लिखना नहीं चाहती क्या?
अगर हां भी तो चलो
अब यहां और नहीं रहना
आओ कूद ही जाओ
कूदो इस अंधेरे से बाहर
कूदो अब मुझ सफेद अन्य स्व में
कि चलो
उठो
अब जीना है
जीना है
मरणोपरांत
इस अगले जीवन में।
By Anuja Sharma

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