"नारी की आवाज़"
By Neeti Banga
" एक दिन, उसके जीवन में "
" बस, एक खबर अख़बार की "
ज़िम्मेदारियों की दस्तक ने आज सुबह, फिर से दरवाज़ा खटखटाया
एक अधूरे सपने को तोड़ कर, फिर कच्ची नींद ने उसे जगाया ...
एक सन्नाटा था, एक ठहराव था प्रातः सवेरे
दिन झांक रहा था, अलविदा कह रहे थे अँधेरे...
धीरे से उस ने ली अंगड़ाई,
हकिकत को वो जुठला न पाई
आलस को दुत्कार कर, फुर्ती से गयी जाग
शुरू हो गयी थी उसके दिन की भागम भाग !
अब बचा नहीं था कोई बहाना
सबको था उठाना
बच्चों को नहलाना
कामवाली से काम करवाना
और फिर पौष्टिक भोजन बनाना
और अगर कुछ कह दे वो खीज का , तो सबका मुँह बन जाना..
हाँ, आसान नहीं था उसका, दुनिया के लिए सदा मुस्कुराना..
फुर्ती से भाग रही थी समय की रफ़्तार
अब ले लिया था उस नारी ने अपना दूसरा अवतार
एक तरफ घर था, और दूसरी तरफ था उसका दफ्तरी संसार
इस भाग दौड़ में ..
बस, चलता रहेगा जीवन का, नोट कमाने का दैनिक कारोबार ...
कुछ सांसें मिली फुर्सत की काम से,
तो उसने सोचा, की जानें खबर संसार की
पर यह क्या, चीख रही थी आज फिर, सुर्खियां अखबार की !
ऐसा लगता था, की सफ़ेद कागज़ पर लाल स्याही से, छापी हुई थी वो ख़बरें
न जाने किसके रक्त से सींची हुई थीं उन चीखों की कब्रें...
दिल को दहलाने वाली ख़बरों की भरमार,
एक औरत के साथ आज फिरसे हुई छेड़ छाड़
मेकअप की परतों से छुपाया उसने घरेलु अत्याचार
एक छोटी से बच्ची के साथ घिनोना बलात्कार ?
पर इसमें नया क्या था? यही तो चिल्लाती है रोज़ की अखबार !
हाँ बातें खूब हुई, चर्चे खूब हुए...सबने कहा दिलायेंगे नारी को पुरे अधिकार
मना लिया नारी दिवस, हुआ तालियों का शोर भरमार
मगर, निराशा की बात यह है, की फिर नयी सुबह आई, और छपा एक नया अखबार
बस, चलता रहेगा जीवन का, नोट कमाने का दैनिक कारोबार…
दफ्तर से लौटी , सब काम निपटा के वो
रस्ते में सबका हाल पूछते, सड़कों की भीड़ से जूझते
बचते बचाते, शायद खुद एक खबर बनते बनते रह गयी
उसकी बेबस आंखें, खामोशी से बहुत कुछ कह गयी ...
अभी शाम बाकी थी
अभी काम बाकी थे
घर पहुंचकर ,चेहरे पर थकान की शिकन, उसने आने न दी
लगी रही काम में, चेहरे से मुस्कराहट जाने न दी…
न जाने कब शाम ढली, कब रात आयी
गिरी पलंग पे वो, थकी थकाइ
कुछ प्यार के पलों के इंतज़ार में, जाने कब वो सो गयी
सपनो की दुनिया में शायद, फिरसे वो खो गयी
फिर सुबह आएगी
फिर, वो दिनचर्या में खो जाएगी
नारी पर दहशत की खबरें, फिर सुर्खिओं में चिल्लायेंगी
फिर छपेगा एक नया अखबार
बस, चलता रहेगा जीवन का, नोट कमाने का दैनिक कारोबार...
लगातार..
लगातार...
लगातार...
By Neeti Banga

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