नारी का कुल
By Sonu Sharma
दो किनारों को मिला कर भी, अकेला जैसे कोई पुल होता है
इन औरतों का भी, क्या कोई कुल होता है?
सजाती रहती है सारा बचपन, जिसे समझ अपना आशियाना
मुश्किल कितना होता होगा भला, उस घर को छोड़ जाना
पर ससुराल भी क्या, उसका हो पाता है
’पराये घर की’ ही तो, आखिर उसे कहा जाता है
नज़र से बचा के, गुजार लेती है बचपन अगर
कैसे छुपाएं जवानी में, खुद को मगर
किसी के बेटे की नीयत हराम होती है
क्यों किसी बेटी की इज़्ज़त नीलाम होती है
आखिर क्यों हर बार, उसे जताना पड़ता है
मैं हूँ मर्दों के बराबर, बताना पड़ता है
वो मीरा है, श्रद्धा है, भक्ति भी है
वो काली है, दुर्गा है, शक्ति भी है
जन्म देती है माँ बनकर, तो साथी बनकर साथ भी देती है
राखी वाला तुम्हे वो, हाथ भी देती है
सक्षम है सब करने में, उसे ना दान चाहिए
उसे तुम्हारी दया नहीं, सम्मान चाहिए |
By Sonu Sharma

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