नाचीज़
By Kriti Chandawat
कहां से शुरू करूं उस नाचीज़ के लिए
जो ना जाने कितनी चीजें दे गया मुझे।।
अनजाने में ही सही…उससे मेरी बात हुई
अरे सच्ची वाली नहीं…फोन वाली बात हुई।।
रोज़ करते बातें हम ना जाने कितनी देर
लेकिन दिल नहीं भरता मेरा, चाहती कुछ और पहर।।
वो बोलता जाता… मैं सुनती रहती…वो पूछता… मैं बताती
वो हसाता उसकी बातों से इस कदर
फिर ध्यान आता मुझे की हो गई है कितनी देर।।
उस खुशी को कैसे बयां करूं
जो मिलती है मुझे उससे बातें करने में।।
शायद उसे ये एहसास दिला सकूं कभी
की है मेरे वो दिल के हर कोने में।।
क़िस्मत से मिली हूं उससे मैं
यूंही नहीं है हमारा टकराना।।
कुछ बहुत अच्छे कर्म किए होंगे मैने
जो नसीब हुआ मेरा उसकी दुनियां में आना।।
कभी टांग खींच देगा, तो कभी मुझे समझाएगा
कभी शरमाएगा, तो कभी सब कुछ बोल देगा।।
सबका दिल जीत ले, ऐसा है वो पागल
उसकी नज़र उतार कर, लगा दूं उसे छोटा सा काजल।।
By Kriti Chandawat

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