ना जाने कितनी बार
By Amarjit Kaur
ना जाने कितनी बार बिखर कर खुद को समेटा है,
और कितनी बार टूट के जोड़ा भी है।
मन में जब कसक सी उठती है,
हर धड़कन सिहर सी जाती है।
दिल में तूफानी लहरें उठकर,
गहरा द्वंद्व मचाती हैं।
दर्द-ए-दिल को दबाते रोकते
ये आँखें छलक सी जाती हैं।
आँखों में आँसू थामकर दर्द को छुपाया है,
दूसरों संग ख़ुद को भी इक झूठ से बहलाया है।
ना अब ख्वाहिशें हैं, ना ही सपने सजाये हैं,
बस इस एहसास से ख़ुश हैं कि गुज़रे दिन मुस्कुराए हैं।
हर वक़्त ज़हन में हैं आप,
इन आँखों के उजालों में हैं आप,
हर धड़कन में हैं आप,
हर एहसास में हैं आप,
हर बात में भी आप,
मेरा अक्स भी हैं आप।
ना जाने कितनी बार इस मन को समझाया है,
आपकी तस्वीर को देख कर मन भरा,
फ़िर मुस्कुराया है।
ना जाने कितनी बार बेबसी ने घेरा है,
तब आपकी बोलती आँखों और मुस्कुराहट ने
दिखाया सवेरा है।
आपकी आँखों में दमक देख कर,
इन आँखों में भी रौनक आ जाती है,
ना जाने कितनी बार ज़िंदगी यही मंज़र दोहराती है।
ना जाने कितनी बार।
By Amarjit Kaur

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