नदी और मैं
By Ishika Morolia
मैं नदी सा चला बहता,
हर पल गुमां में रहता
तू रुकना मत ओ धारा,
बस एक जुबां मैं कहता।
अभी जन्मा था, अभी था नया,
मुझमें क्रोध बहा, कभी बही दया
कभी संभला, संभाला सबको,
कभी झरने सा मैं गिर गया।
फिर नदी सा चला बहता,
हर पल गुमां में रहता
तू रुकना मत ओ धारा,
बस एक जुबां मैं कहता।
प्रभाव हैरत-अंगेज है,
अंग-अंग हुनर की मेज़ है
मैंने पत्थर चीरे जवां-जवां,
अभी बहाव मेरा तेज़ है।
मैं नदी सा चला बहता,
हर पल गुमां में रहता
तू रुकना मत ओ धारा,
बस एक जुबां मैं कहता।
कहीं छाड़न झील सा छूट गया,
मैं टुकड़ों टुकड़ों में टूट गया
वो मिट्टी गई, वो फूल गया,
कभी हिस्सा था मेरा, मैं भूल गया।
मैं नदी सा चला बहता,
हर पल गुमां में रहता
तू रुकना मत ओ धारा,
बस एक जुबां मैं कहता।
भरपूर गया, कहीं रस गया,
कहीं बाढ़ बन के मैं बरस गया
मैंने चाहा सबका दिल जीतूं,
कोई रेगिस्तान सा तरस गया।
मैं नदी सा चला बहता,
हर पल गुमां में रहता
तू रुकना मत ओ धारा,
बस एक जुबां मैं कहता।
मैंने प्यास बुझाई, घर सींचे,
मैंने रिश्तों के रस्से खींचे
अब सोचता हूं कहां चूक गया?
ये गला क्यों मेरा सूख गया?
जो नदी सा था बहता,
हर पल गुमां में रहता
तू रुकना मत ओ धारा,
बस एक जुबां मैं कहता।
यूं ही एक दिन सब ढल गया,
मैं प्रभु के समुद्र में घुल गया,
क्या खोया और क्या था पाया?
जो हाथ में था सब धूल गया!
मैं नदी सा था बहता,
हर पल गुमां में रहता ।
तू रुकना मत ओ धारा,
बस एक जुबां मैं कहता ।।
By Ishika Morolia

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