नज़रें
Updated: Dec 3, 2022
By Deepali Bhatia
मानक पर खरी नहीं,
बेतरतीब है,
बेढब सी,
सांचे से बिल्कुल बाहर..
गहरा सांवला रंग!
चेहरे से होकर,
ऊपरी ढांचे से घुसकर,
तेज़ी से,
निरंतर...
वो नज़रें ..
रोम रोम से वेध कर,
अंतर्मन को भेद कर,
उसकी काया को वस्तुकीकृत कर,
उसकी रूह पर आघात कर,
वो नजरें..
कैसे झुकती नहीं?
वो कैसे गुन्हेगार नहीं?
वो कैसे कसूरवार नहीं?
करें उन नजरों से कोई...
जवाब-तलब..!!
By Deepali Bhatia

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