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नईं शुरुआत

Apr 9, 2023
2 min read

By Kunal Deepak Devre


नया पेड़, नया घोसला,

नया साथी, नया परिवार,

नई उम्मीदें, नया प्यार,

नये सपने, नए अपने,

नया रिश्ता, और रिश्तेदार भी,

नई जीत, नई हार भी,

कितना कुछ बदल जाता है,

या यूं कहें कि सब कुछ नया हो जाता है,

छोटा सा शबद,

बड़ी अदब सी कर देता है इक लड़की की ज़िन्दगी,

उसकी चंचलता, वो मस्तीयां,

वो पापा को सताना, माँ से झगड़ना,

बहन को मनाना, भाई से लड़ना,

सब कुछ सिमट जाता है इक घूँघट की ओट में,

भाग कर घर आते ही पास के सोफे पर फेका हुआ वो सामान का झोला,

अब सलीके से मेज पर रखना,




बेझिझक माई के आँगन तक आने वालें कदमों का

घर की डेली तक अटक जाना,

नखरे कर बापू के हाथों से वो पहला कौर खाना - छोड़,

अब सबसे आखिर में खाने बैठना, अकेले,

छोटी छोटी बातें अपनी सहेली को बताने से लेकर,

नणंद - सास के बड़े बड़े तानों को हँस कर टाल देने तक,

सब कुछ बदल जाता है,

या यूं कि सब नया हो जाता है,

ये बदलाव है या नयापन,

माँ की सीख तो अक्सर यही कहती थी,

की नयापन खुशियाँ और सीख लेकर आता है,

मगर इस नए पन में न जाने कौन क्या नया पाता है,

बापू के सामने जो आँसू मोती होते थे,

वो क्यूँ एकांत की 'सीपी' में कैद रखने पड़ते हैं,

माँ की मार और वो चीख चीख कर रोना,

क्यूँ अब इक कोने में घर की आबरू और सिसकियों में तब्दील हो जाता है,

कुछ ना सहन करने वाली,

कोई दुख न वहन करने वाली,

क्यूँ बन जाती है सहनशीलता की प्रतीक,

आखिर ये कैसा नयापन और कैसी इसकी सीख..?



By Kunal Deepak Devre




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