धूप आखर
By Kavita Bhatt
धूप आखर प्रखर हो गये
और साँझ पीड़ा पीड़ा
दिन बिखर बिखर गया
शब्दों के जाल में !
मैं,फिर भी “मैं” ही रहा
और नूतन सवेरा
फिर से मुस्कुरा गया!
बस यूँ ही
अक्षर से शब्दों तक का सफ़र
मानो कोई भोर से हो साँझ तक का हमसफ़र!
कितना कुछ कहना होता है
एक दिन को
पूरी कायनात से बिखर बिखर कर
जो अक्षर आते हैं
धूप में अक्सर बिखर जाते हैं !
और मन के किसी कोने में साँझ का दर्पण लिए धूप की तपिश की पीड़ा को मानो पी जाते हों ! सच है ना ये धूप धूप से अक्षर और साँझ साँझ से शब्द कब अर्थ बनते हैं पता ही नहीं चलता है ! और फिर से नया सवेरा आ जाता है कायनात से नये शब्दों का इंतज़ार करने !
By Kavita Bhatt

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