धर्मक्षेत्र - कुरुक्षेत्र
By Purnima Bajpai
त्रेता में भूपतियो ने जब,
यह पृथ्वी दहलायी थी।
न्याय-वाद हेतु जामदग्न्य ने,
दुर्गम शपथ निभाई थी।
इस धर्मक्षेत्र में परशुराम ने ,
पाँच रक्त प्रवाह बहाई थी।
इक्कीस बार यह भूमी तब,
क्षत्रिय विहीन हो आई थी।
द्वापर के कालांतर में फिर,
अधर्म ने छलांग लगाई थी।
मार्गशीर्ष की चतुर्दशी को,
महाभारत की बेला आई थी।
धर्म स्थापना की महत्ता,
समय ने फिर बतलाई थी।
अर्जुन को तब श्री कृष्ण ने,
गीता यहां सिखाई थी।
कुरु वंश का है वह कर्मक्षेत्र,
जहां धर्म ध्वजा लहराई थी।
समंत- पंचक की धरा ही है,
जो कुरुक्षेत्र कहलाई थी।।
By Purnima Bajpai

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