धर्म ही विजयी बनेंगे
By Mohan Jha
इस तपोभूमि भारत धरा को क्या हुआ है,
क्या हुआ है मेरे आर्यावर्त्त को?
अम्बर क्षितिज शीतल पवन कानन वही पर
चल रहें क्यों लोग वामावर्त्त को?
भूखण्ड है ये भीष्म गौतम और शिव की,
मनुज क्यों धर्म बिसराने लगे हैं?
सुवासित पुष्प होकर शुष्क मुरझाने लगे हैं,
कदाचित् पाप कर्मों के कुफल आने लगे हैं।
यह काल है संक्रमण का निर-आश मत हो।
करो निज चक्षु अर्जुन सा अटल संकल्प ले लो।
संचय करो निज शक्ति का
सद्भाव का सद्भभक्ति का।
समराग्नि आहुति में हमारे सर गिरेंगे।
पर अधम के पक्ष तो पूरे मिटेंगे।
सत्य जानो मरके भी हम
सत्य को विजयी करेंगे।
धर्मध्वज को कर धरें हम
धर्म ही विजयी बनेंगे।।
By Mohan Jha

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