द्वन्द की देहरी
By Kavita Bhatt
द्वन्द की देहरी में खड़ी रही मैं सदा
सुनो तुम जरा टांक आना वो मेरा सपना
दरवाज़े की ओट में खड़ी
एक सुन्दर मुस्कान हूँ मैं !
अंक अंक में जो तुमने मुझे समेटा था
लेन देन की बाँह फैलाये हुए
जो कुछ तुमने मुझे दिया था
सुनो वो मेरा कभी था ही नही ।
नहीं हो सके मेरे सपने तुम्हारे कभी
नहीं हो पायी वो उम्मीद तुम्हारी कभी
सांझ से निशा तक बस रिसती रही
पिसती रही झुकती रही यूँ ही I
आंकना हैं तो आंक लो मुझे
थोड़ा और खुद को भी झाँक लो
और कितनी सीमा तय करनी हैं
वक़्त के हर आवर्तन पर
और कितनी अग्नि परीक्षा देनी हैं मुझे I
और कितना जज्बातों का विस्तार होगा
कितना और मोह का त्याग होगा
क्या कभी ऐसा होगा कि
समर्पण भी रोयेगा और दम घोटेगा I
मेरे मौन को और कितना चिंतन करना होगा
कौन सा वो निमंत्रण हैं
जो तुम्हें भेजना होगा
ह्रदय के द्वार पर जो कभी दस्तक देगा I
विस्तृत इस गृह-नभ पर जो छत सजी हैं
सुनो वो मेरी ही दी नींव पर टिकी हैं
द्वार पर मैंने अपने सारे सपने टांक दिए हैं
बस अब उन्हें मेरे पंथों को सौंप देना I
द्वन्द की देहरी में खड़ी रही मैं सदा
सुनो तुम जरा टांक आना वो मेरा सपना
दरवाज़े की ओट में खड़ी
एक सुन्दर मुस्कान हूँ मैं !
By Kavita Bhatt

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