द्रौपदी / कुंती
By Rashmi Prabha
कुंती,
तुमने समाज के भय
और राजवंश के मिथ्या मान के लिए
नवजात कर्ण को प्रवाहित कर दिया
पुत्रों की पूरी बात सुने बिना
मुझे पांच के बीच विभाजित कर दिया
नियोग मंत्रों के प्रयोग से
संतान जनने वाली तुम !
तुम तो माँ कहलाने के योग्य ही नहीं थी
जो पुत्र की रक्षा न कर सकी
मेरी रक्षा क्या करती !
तुम्हें क्या अंतर पड़ा
जो तुम्हारे सुयोग्य पुत्र
विलासिता के मद में मुझे हार गए
और दु:शासन अट्टहास करता
मुझे केशों से पकड़ घसीट लाया
....
दम्भ की गर्जना करता कौरव वंश
और दूसरी तरफ …
स्थिर धर्मराज के आगे स्थिर अर्जुन
भीम, नकुल-सहदेव …
भीष्म प्रतिज्ञा करनेवाले पितामह
परम ज्ञानी विदुर
.... !!!
धृतराष्ट की चर्चा तो व्यर्थ ही है
वह तो सम्पूर्णतः अंधा था
पर जिनके पास आँखें थीं
उन्होंने भी क्या किया ?
पलायन, सिर्फ पलायन ....
आज तक मेरी समझ में नहीं आया
कि सबके सब असमर्थ कैसे थे ?
क्या मेरी इज़्ज़त से अधिक
वचन और प्रतिज्ञा का अर्थ था ?
मैं मानती हूँ
कि मैंने दुर्योधन से गलत मज़ाक किया
अमर्यादित कदम थे मेरे
पर उसकी यह सजा ?!!!
…
आह !!!
मैं यह प्रलाप तुम्हारे समक्ष कर ही क्यूँ रही हूँ !
कुंती,
तुम्हारा स्वार्थ तो बहुत प्रबल था
अन्यथा -
तुम कर्ण की बजाये
अपने पाँच पुत्रों को कर्ण का परिचय देती
रोक लेती युद्ध से !
तुम ही बताओ
कहाँ ? किस ओर सत्य खड़ा था ?
यदि कर्ण को उसका अधिकार नहीं मिला
तो दुर्योधन को भी उसका अधिकार नहीं मिला
कर्ण ने तुम्हारी भूल का परिणाम पाया
तो दुर्योधन ने
अंधे पिता के पुत्र होने का परिणाम पाया
.... कुंती इसमें मैं कहाँ थी ?
मुझे जीती जागती कुल वधु से
एक वस्तु कैसे बना दिया तुम्हारे पराक्रमी पुत्रों ने ?
निरुत्तर खड़ी हो
निरुत्तर ही खड़ी रहना
तुम अहिल्या नहीं
जिसके लिए कोई राम आएँगे
और उद्धार होगा !
मैं द्रौपदी
तीनों लोक, दसों दिशाओं को साक्षी मानकर कहती हूँ
कि भले ही महाभारत खत्म हो गया हो
कौरवों का नाश हो गया हो
लेकिन मैंने तुम्हें,
तुम्हारे पुत्रों को माफ़ नहीं किया है
ना ही करुँगी
जब भी कोई चीरहरण होगा
कुंती
ये द्रौपदी तुमसे सवाल करेगी
कुंती का जवाब,
द्रौपदी, मेरी पुत्रवधू !
मैं स्त्री हूं, समझती हूं
तुम अपमान की पीड़ा से आहत हो
तुम्हारी दृष्टि में कुंती दोषी है
मानती हूं
पर मुझ पर लगाए गए सारे आरोप
सही नहीं हैं ...
मेरी विवशता मेरा अपराध बनी
किन्तु इसके लिए
सूर्य को समर्पित मेरा प्रेम गलत था
या समाज की परंपरा ?
पुरुष को जहां सैकड़ों विवाह करने की अनुमति थी
मैं एक कर्ण की जन्म नहीं दे सकती थी ?
प्रेम ईश्वर है
पर कन्या प्रेम के अधिकार से वंचित थी
पांडु से मेरा विवाह सही था ?
नियोग से मां बनना सही था ?
पति पांडु किन्तु
पांच पुत्रों के अलग अलग पिता - सही था ?
कर्ण को धारा में छोड़ा
तो अपनी इच्छा से नहीं
समाज के भय से...
और सूर्य सब देख रहे थे
क्यों सामने नहीं आए ?
जग ने उन्हें क्यों कभी दोषी नहीं माना ?
मेरी नियति थी - कुमाता बनना
सो बनी
पर तुम बताओ मुझे
उस परिस्थिति में
जो मुझे विकलांग कर गई,
मैं क्या करती द्रौपदी ?
मैं राजकन्या !
राज्य और कुल की प्रतिष्ठा हेतु
विवाह की वेदी के सम्मुख बैठी
कदाचित यह मेरा दंड था -
कर्ण को त्याग देने का ...
पहले मिला
मंत्र प्रयोग से मातृत्व
फिर वैधव्य ...
मैं तो कभी सहज थी ही नहीं द्रौपदी !
गृहकार्य में लगी थी
जब पुत्रों की हर्ष पुकार पर
मैंने अनजाने में तुम्हें सबको दे डाला
जानती कि उनके साथ कोई वस्तु नहीं,
मेरी कुलवधु है
तो क्या मैं ऐसा करती ???
पर एक प्रश्न मेरा भी है -
क्या अनभिज्ञता में दी गई मेरी वह आज्ञा
अकाट्य थी ?
मेरे पुत्र मेरी भूल सुधार सकते थे
तुम्हारी अस्मिता की बात थी
तुम स्वयं मना कर सकती थी
यह निस्संदेह उनकी लालसा रही होगी -
पुरुष थे ना, सो मान गए,
पर तुमने क्यों मान लिया ?
द्यूत क्रीड़ा का दास तो था राजकुल !
पर इतना लोभ ! ऐसी लिप्सा !
पराजय पर पराजय
राज्य गंवा दिया
और कुछ न बचा तो दुर्योधन की बात पर
तुम्हें दाव पर लगा दिया...!
जिसे एक दिन स्वयंवर में जीता था
उसे हार गए...!
मैं हतप्रभ सी खड़ी रह गई !
जिस सभा में उपस्थित सारे श्रेष्ठ मौन थे,
वहां मैं क्या कहती !
वैसे भी मैंने कब कुछ कहा ?
तुम अकेली नहीं थी द्रौपदी
मेरा भी चीरहरण हुआ था
और सहायता के लिए तुम ही नहीं,
मैं भी कृष्ण को पुकार रही थी ...
.....
फिर बिना विचारे ली गईं
अंतहीन शपथ और प्रतिज्ञाएं !
इन्हीं के गर्भ में तो पल रहा था -
कुरुक्षेत्र में होने वाला
महाभारत !
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ ...!
असमंजस के भंवर से उबर नहीं पाई
कि किसकी विजय की कामना करूं ?
मैं तो होकर भी -
सौरमंडल के स्वामी की प्रेयसी,
अतुल्य गुणों से मंडित कर्ण की मां
सदैव पराजित ही रही
और यहां भी हार निश्चित थी ...
पांडवों ने तो मुझसे कभी कुछ पूछा ही नहीं,
उनसे क्या कहती !
पर पुत्रमोह में पड़कर
ममता का एक दांव मैंने भी खेला ...
राधेय को बताकर
कि " तू कौंतेय है, ज्येष्ठ है और दानवीर भी"
.....!!!
हारी तो नहीं
किन्तु जीत भी न सकी...!
.......
मान - अपमान के कुरुक्षेत्र में
मैं कुंती,
कुछ नहीं थी द्रौपदी !
फिर भी,
तुम्हारे न्याय की तुला में यदि मैं कारण हूं
तो मुझे क्षमा मत करो
पर इतना अवश्य बताओ
कि नेपथ्य में होकर भी
यदि मेरी भूमिका दोषी की है
तो तुम्हारी भूमिका ... ?
यवनिका उठने से गिरने तक
तुम तो मंच पर थी !
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By Rashmi Prabha

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