द्रौपदी
By Anisha Jain
हर मोड़ पर अब दुशासन खड़ा है
समाज लज्जाहीन पड़ा है।
बैठे सब शकुनि द्यूत बिछाए
ऐसे में गौरव कौन बचाए।
द्रौपदी अब तुम शस्त्र उठा लो
अपना गौरव स्वयं बचा लो।
इस रण में तुम मत होना अधीर
मत खींचने दो दुशासन को चीर।
द्रौपदी तुम किसको लगा रही गुहार
ये है अंधे राजाओं का दरबार।
करो प्रहार तुम बन कर माँ काली
अपने स्वाभिमान मत गिरने दो पांचाली।
सुनो द्रौपदी बात हमारी
अब पाठ पढ़ाने की है बारी।
आज मौन है ये सभा सारी
अपनी लाज बचाने की लो ज़िम्मेदारी।
धर्मराज ने दाँव पर लगा दिया तुम्हारा गौरव
मत मुरझाने दो अपनी आत्मा का सौरभ।
आज मत करो गोविंद की प्रतीक्षा
अपने कौशल की स्वयं करो समीक्षा।
ये रण होगा अब और भी गहरा
इस सभा में पुरुषों का कड़ा पहरा।
तुमसे आस लगाती हर नारी
बन जाओ दुर्गा मत दिखाओ लाचारी।
तूफ़ानों ने अब दे दी है दस्तक
उड़ा डालों पापियों का मस्तक।
तोड़ दो इन अधर्मियों का ग़ुरूर
अहंकार में हो रहे ये चूर।
दिखा दो इन्हें तुम अपना असली स्वरूप
याज्ञसेनी तुम हो प्रचंड अग्नि का रूप।
द्रौपदी रक्षा करो तुम आज अपने मान की
तुम ही हो दुर्गा तुम ही हो जानकी।
By Anisha Jain

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