दोस्ती
By Nirupama Bissa
दोस्ती हो
चांद और सूरज सी
एक ही दिन के
दो छोर थामे खड़े हैं
अडिग।
कभी एक दूसरे से
मिल नहीं पाते हैं
पर
अपने कर्तव्य पथ पर
चलते हैं
बिना रुके , बिना थके।
एक अगर छिप जाए
कभी
जो बादलों की ओट में
दूसरा ,
निकल पड़ता है
उसकी खोज में।
कितने अद्भुत हैं दोनों
दिन को पूर्णता देते हुए।
दोस्ती ,
कुछ कुछ हो
आइसक्रीम जैसी ।
ठंडी ठंडी
कूल कूल,
मिठास से परिपूर्ण।
जो कभी तापमान
बढ़ भी जाए
और पिघल जाए
ये आइसक्रीम
मिठास रहती है
घुली हुई वहीं ।
दोस्ती हो
दो आंखो सी,
समान भाव से
दुनिया को देखती।
सुख में भी छलकती
दुख में भी बरसती ।
कोई भेद न करती ।
दोस्ती हो
बस
दोस्ती जैसी ।
By Nirupama Bissa

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