दोस्ती
By Monika Sha
मैं हिंदी की छात्रा वह अंग्रेजी का स्टूडेंट
मैं तपती गर्मी को सहने वाली
वह सर्दी को झेलने वाला
वह शांत होकर बातें सुनने वाला
मैं उसके सामने बेमतलब की बाते करने वाली
वह हर बात पर माफ़ कर देने वाला
मैं हर बात पर उससे मज़ाक करने वाली
वह ज़िंदगी को गंभीर होकर जीने वाला
मैं ज़िंदगी को बच्चो की तरह जीने वाली
वह अपने घर का इकलौता बच्चा
और मैं भाई बहनो के बीच लाड़ प्यार में पली बड़ी
वह मुस्लिम मैं हिंदू
वह मेरे मुस्लिम के प्रति भ्रम को तोड़ने वाला
मैं उसके हिंदू के प्रति भ्रम को तोड़ने वाली
वह छठ पर्व में मुझसे ठेकुआ मांगने वाला
और मैं ईद मे उससे बिरयानी और सेवैया मांगने वाली
वह मुझे उर्दू शायरी सुनाने वाला
मैं उसे हिंदी कविता सुनाने वाली
वह स्कूल के दिनों में मुझे बैटरी कहके मुझसे जलने वाला
मैं उसे कभी भाव न देने वाली
एक कक्षा में रहते हुए भी एक दूसरे से बाते नही हुई
धर्म, रहन–सहन ,तौर–तरीके सब कुछ अलग है हमारा
सोचती हूं कि कैसे हो गई दोस्ती हमारी
कॉलेज के दिनों में ही
उसे जानने और समझने का मौका मिला
पता चला सबकुछ अलग होने के बावजूद
एक थी सोच हमारी
शायद इसलिए हो गई दोस्ती हमारी।
By Monika Sha

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