दोस्त ने'मत-ए-वली होते है
By Mahendra Dhirajlal Kamdar
घरसे निकले थे, हमतो बस ख़ुशीयोंकी तलाश करने,
मा'लूम हुआ, निकले थे बस दोस्तोंकी तलाश करने,
वो ख़ुश-नसीब होते है, जिनको दोस्त नसीब होते है,
वर्ना कौन निकला है, दिल-ए-वीराँ की तलाश करने,
आसमाँसे क्या पाते, दोस्तसे बढ कर और क्या मांगते,
ऐ दिल निकला है तू, और कौनसा रिश्ता तलाश करने,
थके हुए मन का आराम, तन्हाई में महफ़िल होते है,
महफ़िल-ए-रक़ीबमें, क्यूँ चला है दोस्त तलाश करने,
अमीर ना ग़रीब होते है, वो बस दिलके क़रीब होते है,
दोस्ती के भेष में, कहाँ चला है तू दौलत तलाश करने,
हिंदू ना मुस्लिम होते है, तज्सीम-ए-मज़हब होते है,
ख़ुदा को, कहाँ चले हो दैर-ओ-हरम में तलाश करने,
वो तो न ख़त्म होनेवाली बातों का सिलसिला होते है,
वर्ना ख़ामोशीयाँ ही है, दिल-ए-बर्बादकी तलाश करने,
मंज़र ग़म के भी होते है, हर-दम दोस्त शरीक होते है,
इस दौर-ए-ग़ममें, कहाँ चला तू हौसला तलाश करने,
माँगने से कहाँ मिलते है, दोस्त ने'मत-ए-वली होते है,
अदना क्या 'आली भी भटकते है, उनकी तलाश करने,
जाँ-ओ-ईमाँ क्या चीज़ है, दोस्तीमें ग़ैरत भी लुटा दो,
वर्ना जाओगे कहाँ, इस जहाँमे ख़ुदको तलाश करने,
जज़्बा-ए-दोस्ती से बढ़ कर तौफ़-ए-हरम क्या होते है,
"काफ़िर",
गरदोस्तसाथहो, तोक्यूँचलेख़ुदाकीतलाशकरने.
By Mahendra Dhirajlal Kamdar

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