दो पल
By Sanat Raj
वो था मुसाफिर दुनिया की गलियों का,
अब किसी आसमान का सितारा बन गया,
एक झरोखे में वो आजाद परिंदा,
यादों की दरिया का शिकारा बन गया।
कल तक तो सामने मौजूद था,
अब सिर्फ तस्वीरों में दिखता है,
ढूंढ लिया बाजार सारा,
गुजरा पल कहां बिकता है।
करनी थी शिकायतें बहुत सारी,
थोड़ा और झगड़ना था,
जताना था मोहब्बत भी उससे,
साथ उसके और बिगड़ना था।
हुआ अंधेरा हकीकत ने दस्तक दी,
अब नही वो यहां का वासी,
चाहे कितना भी भाग लो सत्य से,
जीवन का सत्य ले जाता काशी।
रखना अहंकार ना जीवन में,
पल में धूल हो जाना है,
पल दो पल के शायर है सभी,
दो पल जी कर चले जाना है।
By Sanat Raj

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