दो धागे
By Teri Kalam
कही बंदिश है तो कही रुकावट
कोई तड़प उठे दिल में बन आहट ।
ऐसे कुछ हालात थे उसके
बन आंसू जज़्बात थे बिखरे ।
देख परिंदा ख्वाब बन आया
उड़ने का सपना सजाया ।
सब छोड़ छाड़कर भागे थे वो
कुछ पास नहीं पर धागे थे दो ।
सज़ा सपना एक से बुन डाला
तो एक बना यादों की माला ।
बुना धागा वह तोड़ ना पाये
यादों की माला हर मोड़ पे आये ।
हालात बिगडे़ तो ऐसे थिरके
उड़ दिये वो पल पल मरके ।
मरहम बन वे उडा़न थी आई
नई उमंगे साथ थी लाई ।
दिल में जब छिड़ी तड़पन
तो धागों की सुलझी उलझन ।
By Teri Kalam

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