देश याद आया
By Mehul Makwana
कल जो उड़ चले थे कुछ परिंदे,
आज उन्हें देश याद आया!
पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के बाद,
आज फिर सबको देश याद आया!
चले गए थे जो चंद चीज़ों की खनक के लिये,
आज जब सब ने ठुकराया तब उनको देश याद आया!
बड़े नाज़ों से सुनाते थे किस्से अपनी क़ामयाबी के,
आज जब वहाँ डर महसूस हुआ तो देश याद आया!
थकते नहीं थे तारीफ़ करते, वहाँ के आलाकमान की,
जब हुक़्मदारों ने हाथ खड़े किए तो देश याद आया!
सुना है, बड़े चर्चे थे वहाँ की रंगीन रातों के,
आज जब घना अँधेरा छाया तो देश याद आया!
अपने बुला बुला कर अपनी आख़री साँसें गिन रहे थे,
आज जब ख़ुद की साँसों पे बन आयी तब देश याद आया!
ठुकराया कुछ इस क़दर, की न घर के रहे न घाट के,
जब देश ने गले गया, तब जा के इन्हें ये अपना देश याद आया!

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