देखते ही देखते
By Deeksha Chugh Bagla
देखते ही देखते जाने कैसे सब बदल गया है
सुबह का सूरज जैसे शामों में ढल गया है ।
जैसे काली रात इन तारों को नचा रही है
जैसे चांदनी कहीं चुपके से संगीत बजा रही है ।
शांत मधुर रातें मुझे कुछ सता रही हैं
जानती मैं भी नहीं कि मुझे यह क्या बता रही है !
कहीं इसे भी इंतजार तो नहीं सुबह से मिलने का
लेकिन मिलते ही फिर बिछड़ने का गम मना रही हैं ।
और देखो तो, बैरन किस्मत कैसे खिलखिला रही है
मानो वही कोई खेल रचा रही है।
By Deeksha Chugh Bagla

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