दुर्गा अवतार
By Vikas Kumar Lodhi
महामारी के इस अंधेरे में, बनकर उभरीं एक नई धूप|
इस कठिन परिस्थिति में, दिखाया अपना एक अलग रुप||
मैं तो अपने व्यापार के डुबने का रो रहा था रोना|
वो मेरे व्यापार को बचाने, ले आयी अपने बाबुल का दिया सोना||
कमजोर आर्थिक स्थिति में, बनीं अपने परिवार का आधार|
घर के साथ- साथ घर से ही, संभाला अपना दफ्तर-व्यापार||
मुझे नहीं पसंद काम के बीच में, जरा भी आवाज|
बच्चे को गोद में लिए उसने, घर से निपटाए सारे काम-काज||
उनकीं इस परिश्रम-त्याग के आगे, मेरा हर अभिमान फीका है|
देवी का रूप कहते हैं इन्हें, मैंने सच में इनमें मां दुर्गा देखा है||
By Vikas Kumar Lodhi

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