दुनिया तुम्हारी
By Pushkal Sinha
एक बात कहूं?
सुनोगी क्या?
छोड़ जहा एक बार को सारा,
मुझको फिर तुम चुनोगी क्या?
आओ, देखो दुनिया मेरी,
जिसमे हर रात चांदनी होती है।
सूरज तो तेज़ निकलता है,
पर छांव तुम्हारी होती है ।।
तारे भी अपलक रातों को,
बस खोजा तुमको करते है।
देख तुम्हे बस टूटने को,
एक–दूजे से लड़ते है।।
उन कुन–कुन सर्द रातों को,
सबको कुछ कुछ होता है ।
दिखता तो है सभी को,
पर चांद तुम्हारा होता है।।
सोच तुम्हारे गेसू को,
हवा दिशाएं बदला करती है।
मदहोश तुम्ही सा हो जाने को,
कस्तूरी मचला करती है।।
यहां हर फूल तुम्हारा होता है,
हर दश्त तुम्हारे होते है,
सोता है जब कोई यहां पर,
उसके ख्वाब तुम्हारे होते है।।
नाम तुम्हारा लेने पर,
सबके सर झुक जाया करते है।
तमाम राही, तमाम राहें,
तुम पर रुक जाया करते है ।
तुमको पास बुलाने को,
शजर आम गिराया करते है।
बरसो से भरे हुए,
बादल बूंद बरसाया करते है।
गिरे हुए उन आमों में,
मिठास तुम्हारी होती है।
बादल की सारी बूंदों में,
बरसात तुम्हारी होती है।
यहां कवियों की कविताओं में,
हर बात तुम्हारी होती है ।।
यहाँ हर दिन तुम्हारा होता है,
हर रात तुम्हारी होती है।।
By Pushkal Sinha

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