दुनिया की सैर
By Rajesh Kumar Verma
किताबों से इतर भी दुनियां में, बहुत कुछ है देखने को,
किताबों की दुनियां से तुम, बाहर निकलकर तो देखो।
बाहर बहुत सुन्दर हैं नजारे, प्रकृति ने जो हैं हमें सौंपे,
बहुत सुकून है, किताबों से बाहर निकलकर तो देखो।
माना अकेलेपन में किताबें,हमारी अंतरंग मित्र होती हैं,
पर प्रकृति भी किसी अच्छे दोस्त से, कम नहीं होती है।
हरी-भरी वादियां बरबस ही, ध्यान खींचती है निज ओर,
पक्षियों का कलरव, मधुर संगीत सा गूंजता है कानो में।
कल-कल करती बहती नदिया, मधुर संगीत सुनाती है,
समुद्र की लहरें शोर मचाती, तन-मन भिगो जाती हैं।
खुले आसमान की स्वच्छ हवा में,जब हम सांसे लेते हैं,
मन आह्लादित हो कह उठता है, मुसाफ़िर बन सैर कर।
चली गयी जो ये जवानी लौटकर फिर कभी नहीं आनी,
जीभर जीवन जी लो यारो,फिर कभी वक्त मिले न मिले।
आओ खुले आसमान में,स्वछन्द विचरण तो कर लें हम,
एक बार घर से बाहर निकलकर, दुनियां तो देख लें हम।
गर रहा तू घर में कैद महरूम रह जाएगा खूबसूरती से,
बहुत निराली है ये दुनिया, निराले हैं बहुत इसके लोग।
कोई नहीं है पराया, सारा संसार अपना नजर आएगा,
माया - मोह की कैद से तुम, बाहर निकलकर तो देखो।
बड़ी प्यारी है धरती हमारी, इसकी सुन्दरता तो देखो,
यारो किताबों की दुनियां से, बाहर निकलकर तो देखो।
By Rajesh Kumar Verma

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