दीवार के कान
Updated: Jul 18, 2025
By Aayush Kukreja
एक घर है हमारा
बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर ।
हम चार जने रहते हैं
मैं हूँ
माँ है
बहन है
और पापा।
पापा बड़े अकेले से लगते हैं आजकल
अलग सोते हैं हम सब से
ज़्यादातर चुप-चाप रहते हैं।
ऐसा लगता है कि उन्हें कुछ शिकायत है हमसे
हमें भी है उनसे
मगर यूँ देख
सहम जाता हूँ
अच्छा नहीं लगता है।
कभी–कभार
रात के ग्यारह बज रहे होते हैं
सब अपना बिस्तर लगा रहे होते हैं
और वो घर के कुछ छोटे-मोटे काम कर रहे होते हैं
ज्यादा नहीं
सिर्फ हाँ-ना में बात करते हैं।
कभी–कभार
मुझे वो डाँटते भी नहीं हैं।
हम वक्त नहीं बिताते उनके साथ ज़्यादा
ऐसा लगता है
छोड़ दिया है उनको हमने
मैंने बात नहीं की है उनसे काफी समय से
हँसा भी नहीं हूँ उनकी बातों पे...
एक तस्वीर आती है दिमाग में
छोटा था
पापा फैक्ट्री से घर आते थे
बाहें खोल के
आँखें बंद कर लेते थे
मुझे आवाज़ देते थे
मैं दौड़ता हुआ जाकर गले लग जाता था उनके
उनके पसीने की खुशबू
और
फटे हाथों का लम्स
कैसे उन्हें इस काग़ज़ पर उतारू?
अब दाढ़ी सफेद हो चुकी है
आगे के बाल झड़ गए हैं लगभग
गर्दन तक रज़ाई ओढ़े
मेरे साथ वाले कमरे में ही सो रहे हैं
बड़ी याद आ रही है उनकी।
मेरे और उनके कमरे के बीच की जो दीवार है न
जिसकी बिलकुल उस तरफ वो सो रहे हैं
उस दीवार के कान में कुछ कहा है मैंने
शायद पहुंच जाए उन तक।
By Aayush Kukreja

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